मसूरी । एक समय था जब पत्रकार को तटस्थ या निष्पक्ष माना जाता था। पत्रकार की व्याख्या यह थी कि ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ । वह सार्वजनिक स्थल पर या सड़क पर चलते हुए किसी नेता की चाय पीना तो दूर उसकी साया से भी इसलिए दूर भागता था कि कहीं जनता की नज़र में उसके पति अविश्वास की भावना न पनप जाय । मगर अब साए की बात तो दूर बल्कि कुछ संसाधन भोग के लिए सार्वजनिक मंचों पर अनेक पत्रकार दागी नेताओं को खूब महिमामण्डित कर, जाने अनजाने उन नेताओं के चुनाव प्रचार का हिस्सा नज़र आ रहे हैं ।


कुछ समय पूर्व तक पत्रकारों द्वारा आयोजित किसी भी समारोह का मुख्य अतिथि निश्चित तौर पर पत्रकारिता या लेखन से जुड़ा कोई सम्मानित नाम होता था । कार्यक्रम का उद्देश्य अनुभवि पत्रकार साहित्यकार के अुनभवों से अपना निज ज्ञान बढ़ाना, सुचिता व अपनी पत्रकारिता को अधिक स्वच्छ व असरदार बनाना होता था । मगर आज मापदण्ड बिल्कुल बदले नज़र आ रहे हैं । यह किसी एक शहर या किसी एक पत्रकार संगठन की बात नहीं है अक्सर हर कहीं यह देखने को मिलता है कि सब कुछ पता होने के बावजूद जब पत्रकार स्वार्थ सिद्वी के लिए एक दागी नेता को सार्वजनिक मंच पर महिमामण्डित करने लग जाते हैं । तो तब ऐसे पत्रकारों के हृदय को गहरा आघात पंहुचता है जिन्होने पत्रकारिता के उच्च मापदण्डों के संरक्षण के लिए जीवन खफा दिया है ।


मनन करने वाली बात है कि पत्रकारिता उस दौर में भी हुआ करती थी जब पत्रकार के पैरों में ढ़ंग की सैंडिल भी नहीं होती थी । जबकि एंड्रॉयड या आई फोन के इस जमानें में आज हम घर बैठै ही पत्रकारिता के संसाधनों से लैस हैं । एंड्रॉयड फोन, आई फोन और लैपटाॅप के होते हुए हमारे पास चलते फिरते ऑफिस हैं तो फिर क्यों हम अनावश्यक संसाधनों की जरूरत पैदाकर किसी नेता के रहमोंकरम पर अपनी स्वतन्त्र लेखनी को पराधीन समझे जाने का जाखिम ले रहे हैं, ऐसे में जनता की नज़र में तो हमारी विश्वसनीयता घटती ही है । पत्रकारों मित्रों को बुरा न मानते हुए इस पर चिंतन मनन तो करना ही चाहिए । आखिरकार जनता द्वारा पूर्ण पत्रकारों से जीवन में सुचिता की तो जरूर अपेक्षा की जाती है । बहरहाल कहां जा रही है हमारी पत्रकारिता इस विषय पर हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर गोष्टी रखने का प्रयास रहेगा ।

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